Thursday, January 8, 2015

page 3.............first read page -2

 मेरे बहुत मित्र यहाँ  रहते थे। हम सब मिल कर हर त्यौहार को उल्लास के साथ मनाते  थे।  समय बीतता गया और पता भी नहीं चला कब हम जवान हो गए। गुरु जी का जन्म दिन था सारे पहाड़ के घरों को  बिजली के बल्ब की लड़ियों से सजाया गया था।  मंदिर को भी खूब सजाया गया था।  

मंदिर में प्रसाद चढाने के लिए जाना और प्रसाद चढ़ा कर वापिस आना बहुत रौनक दिखती थी।  चाय  पकोड़ी, टिक्की, गोल गप्पे, भल्ले पापड़ी, मिठाई खा कर बहुत  मज़ा आता था।  तरह तरह की दुकाने और तरह तरह के झूले झूलने में बहुत मज़ा आता था। इस जलुश में नये-पुराने मित्रों से भेंट तो पक्की थी। रिश्तेदार भी इस जलूस में जरूर मिलते थे।    सारी सड़क पर बहुत भीड़  होती थी।  सड़क के दोनों और लोग-महिला युवक युवती  जलूस देखने के लिए कई घंटों पहले ही अपनी जगह घेर कर बैठ जाते थे। परिवार के सभी लोग ऐसे सजते थे जैसे किसी शादी में जा रहे हों।  युवक युवती तो ऐसे सजते थे जैसे फैशन शो में जा रहे हों। लालकिले से लेकर  पंचकुईयाँ रोड तक जगह जगह घरों और सड़क को बिजली के बल्बों की लड़ियों से सजाया गया था। 

गुरु जी के जन्म दिन पर हलवा चने पूरी खूब खाने को मिलता था। नेता रत्न लाल जी सबसे चंदा लेकर प्रसाद बटवाता था। मेरे मित्र के पिताजी तो हर वर्ष अपने खुद के रुपयों से कीर्तन करते और जलूस में आने वालों को खुद अपने हाथों से बनाया हुआ हलवा छोले पूरी बांटते थे।  

No comments:

Post a Comment