पंचकुईयाँ के पहाड़ पर कश्मीर बस्ता था। अनोखा शहर था। सब को एक दूसरे से लगाव और प्यार था। सब एक दूसरे की ईज्जत करते थे।
सब सुख-दुःख में एक दूसरे के काम आते थे। परचून की दुकान, राशन की दुकान सब्जी की मंडी, मीट की दूकान लकड़ी और कोयले की टाल।
हर समय मेला सा लगा रहता था पंचकुईयाँ के पहाड़ पर। सारी पहाड़ी पर लाखों छोटे छोटे घर बने हुए थे। घरों में टीवी नहीं होते थे परिवार के सभी लोग एक सरकारी सेंटर में टीवी पर फिल्म और चित्रहार देखते थे। महीने में एक -दो बार सरकारी प्रोजेक्टर से बढ़िया -बढ़िया फिल्म भी दिखाई जाती थी।
यहाँ नगर पालिका का एक स्कूल था। पंचकुईयाँ के सभी बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे। मै और मेरे मित्र पंचकुईयाँ की इस पहाड़ी से बेर तोड़ कर भी खाते थे।
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